भारतीय संविधान के अनुच्छेद 165 के अंतर्गत प्रत्येक राज्य में एक महाधिवक्ता (Advocate General) की नियुक्ति की जाती है, जो राज्य सरकार का सर्व...
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 165 के अंतर्गत प्रत्येक राज्य में एक महाधिवक्ता (Advocate General) की नियुक्ति की जाती है, जो राज्य सरकार का सर्वोच्च विधिक सलाहकार होता है। 15 नवंबर 2000 को बिहार पुनर्गठन अधिनियम, 2000 के तहत झारखंड राज्य के गठन के साथ ही इस संवैधानिक पद की स्थापना हुई। तब से लेकर 2026 तक कई प्रतिष्ठित वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने झारखंड के महाधिवक्ता के रूप में कार्य किया है और राज्य की न्यायिक, प्रशासनिक तथा नीतिगत दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
यह लेख झारखंड के महाधिवक्ता पद के इतिहास, संवैधानिक महत्व, नियुक्तियों, प्रमुख कानूनी हस्तक्षेपों और वर्तमान स्थिति का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
झारखंड के महाधिवक्ता की संवैधानिक भूमिका
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 165 राज्यपाल को यह अधिकार देता है कि वह उच्च न्यायालय के न्यायाधीश बनने की योग्यता रखने वाले किसी योग्य विधि विशेषज्ञ को राज्य का महाधिवक्ता नियुक्त करे।
महाधिवक्ता की प्रमुख जिम्मेदारियां हैं:
राज्य सरकार को कानूनी सलाह देना
उच्च न्यायालय एवं सर्वोच्च न्यायालय में राज्य का प्रतिनिधित्व करना
संवैधानिक और प्रशासनिक मामलों पर सरकार को मार्गदर्शन देना
विधायी प्रस्तावों और नीतियों की कानूनी वैधता सुनिश्चित करना
झारखंड राज्य बार काउंसिल में भी महाधिवक्ता पदेन सदस्य के रूप में शामिल होता है।
झारखंड के सभी महाधिवक्ताओं की सूची (2000-2026)
प्रारंभिक दौर: झारखंड के प्रथम महाधिवक्ता एम. एम. बनर्जी (2000-2004)
राज्य गठन के बाद झारखंड के प्रथम महाधिवक्ता के रूप में एम. एम. बनर्जी की नियुक्ति हुई। उस समय राज्य के सामने न्यायिक ढांचा विकसित करने, सरकारी वकीलों का नेटवर्क तैयार करने और नए प्रशासनिक तंत्र को कानूनी आधार प्रदान करने जैसी चुनौतियां थीं।
उन्होंने न केवल राज्य के प्रारंभिक मुकदमों की रणनीति तैयार की बल्कि युवा अधिवक्ताओं को भी प्रशिक्षित किया, जिनमें से कई आगे चलकर उच्च न्यायालय के न्यायाधीश बने।
अनिल कुमार सिन्हा और संस्थागत स्थिरता का दौर
एम. एम. बनर्जी के बाद अनिल कुमार सिन्हा ने महाधिवक्ता का पद संभाला। उनके कार्यकाल में नवगठित विभागों, सार्वजनिक उपक्रमों और प्रशासनिक संस्थाओं से जुड़े कानूनी विवादों को व्यवस्थित किया गया।
2011 में उन्हें दूसरी बार महाधिवक्ता नियुक्त किया गया। इस दौरान राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय (NUSRL), रांची की स्थापना से जुड़े भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास विवादों में उन्होंने राज्य का सफलतापूर्वक पक्ष रखा।
एस. बी. गडोदिया और जनजातीय भूमि कानूनों की रक्षा
झारखंड के तीसरे महाधिवक्ता एस. बी. गडोदिया का कार्यकाल विशेष रूप से जनजातीय भूमि संरक्षण कानूनों के लिए याद किया जाता है।
उन्होंने छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (CNT Act) से जुड़े कई महत्वपूर्ण मामलों में राज्य सरकार को कानूनी सलाह दी। अनुसूचित जनजातियों की भूमि को ऋण के लिए गिरवी रखने से जुड़े विवादों तथा सेवा नियमों में बदलाव के मामलों में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही।
राजनीतिक अस्थिरता और महाधिवक्ता कार्यालय (2008-2015)
2008 से 2015 तक झारखंड में राजनीतिक अस्थिरता का दौर रहा। सरकारों के बार-बार बदलने से महाधिवक्ता कार्यालय भी प्रभावित हुआ।
पी. के. प्रसाद का कार्यकाल
18 सितंबर 2008 को पी. के. प्रसाद को महाधिवक्ता नियुक्त किया गया। उनके कार्यकाल में 34वें राष्ट्रीय खेलों से जुड़े वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों और अन्य चर्चित मामलों में राज्य का प्रतिनिधित्व किया गया।
राष्ट्रपति शासन और एम. सोहैल अनवर
2013 में राष्ट्रपति शासन लागू होने पर महाधिवक्ता एम. सोहैल अनवर की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई। उन्होंने राज्यपाल प्रशासन को कई संवेदनशील मामलों में कानूनी सलाह प्रदान की, जिनमें विवादित हाउसिंग बोर्ड आवंटनों को रद्द करने का निर्णय भी शामिल था।
आधुनिक झारखंड और कानूनी सुधारों का दौर (2015-2026)
विनोद पोद्दार (2015-2017)
वरिष्ठ अधिवक्ता विनोद पोद्दार कराधान, श्रम कानून और संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ माने जाते थे। उन्होंने सरकारी अधिवक्ताओं के लिए जवाबदेही और प्रदर्शन आधारित कार्यप्रणाली विकसित की।
अजीत कुमार (2017-2020)
रघुवर दास सरकार के दौरान अजीत कुमार ने सेवा मामलों, प्रशासनिक सुधारों और बड़े बुनियादी ढांचा परियोजनाओं से जुड़े मुकदमों में राज्य का नेतृत्व किया।
राजीव रंजन का कार्यकाल: औद्योगिक और पर्यावरणीय कानूनों का नया अध्याय
7 फरवरी 2020 को राजीव रंजन झारखंड के 12वें महाधिवक्ता बने।
उनके कार्यकाल में निम्नलिखित विषय प्रमुख रहे:
1. गैर-अनुसूचित क्षेत्रों में नियुक्तियां
सरकारी नौकरियों में आरक्षण और भर्ती से जुड़े संवैधानिक विवादों में राज्य का पक्ष रखा गया।
2. पर्यावरण एवं खनन विवाद
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) और झारखंड उच्च न्यायालय में पर्यावरणीय मामलों की पैरवी की गई।
3. औद्योगिक परियोजनाएं
गोड्डा पावर प्लांट सहित कई औद्योगिक परियोजनाओं से जुड़े भूमि और पर्यावरण विवादों में राज्य सरकार का प्रतिनिधित्व किया गया।
वर्तमान महाधिवक्ता: रोहिताश्व रॉय (2026-वर्तमान)
14 जून 2026 को राजीव रंजन के इस्तीफे के बाद वरिष्ठ अधिवक्ता रोहिताश्व रॉय को झारखंड का 13वां महाधिवक्ता नियुक्त किया गया।
15 जून 2026 को उन्होंने औपचारिक रूप से पदभार ग्रहण किया। उनके सामने वर्तमान में पर्यावरण नीति, औद्योगिक निवेश, भूमि विवाद और लंबित संवैधानिक मामलों में राज्य का प्रभावी प्रतिनिधित्व करने की चुनौती है।
झारखंड के विकास में महाधिवक्ता की भूमिका
झारखंड के महाधिवक्ताओं ने केवल न्यायालयों में राज्य का प्रतिनिधित्व ही नहीं किया, बल्कि जनजातीय अधिकारों की रक्षा, औद्योगिक विकास, भूमि सुधार, पर्यावरणीय संतुलन और प्रशासनिक स्थिरता सुनिश्चित करने में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
राज्य के गठन से लेकर वर्तमान समय तक यह पद झारखंड की संवैधानिक व्यवस्था का एक मजबूत स्तंभ बना हुआ है।
FAQs
झारखंड के वर्तमान महाधिवक्ता कौन हैं?
वर्तमान में रोहिताश्व रॉय झारखंड के महाधिवक्ता हैं। उनकी नियुक्ति जून 2026 में हुई।
झारखंड के प्रथम महाधिवक्ता कौन थे?
एम. एम. बनर्जी झारखंड के प्रथम महाधिवक्ता थे।
महाधिवक्ता की नियुक्ति कौन करता है?
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 165 के तहत राज्यपाल महाधिवक्ता की नियुक्ति करते हैं।
महाधिवक्ता का मुख्य कार्य क्या है?
राज्य सरकार को कानूनी सलाह देना और न्यायालयों में राज्य का प्रतिनिधित्व करना।

कोई टिप्पणी नहीं